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सम्पूर्ण कामायनी

 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,  बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से,  देख रहा था प्रलय प्रवाह। नीचे जल था ऊपर हिम था,  एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता,  कहो उसे जड़ या चेतन। दूर दूर तक विस्तृत था हिम,  स्तब्ध उसी के हृदय समान, नीरवता-सी शिला-चरण से,  टकराता फिरता पवमान। तरूण तपस्वी-सा वह बैठा,  साधन करता सुर-श्मशान, नीचे प्रलय सिंधु लहरों का,  होता था सकरूण अवसान। उसी तपस्वी-से लंबे थे,  देवदारु दो चार खड़े, हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर,  बनकर ठिठुरे रहे अड़े। अवयव की दृढ माँस-पेशियाँ,  ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार, स्फीत शिरायें, स्वस्थ रक्त का,  होता था जिनमें संचार। चिंता-कातर वदन हो रहा,  पौरूष जिसमें ओत-प्रोत, उधर उपेक्षामय यौवन का,  बहता भीतर मधुमय स्रोत। बँधी महावट से नौका थी,  सूखे में अब पड़ी रही, उतर चला था वह जल-प्लावन,  और निकलने लगी मही। निकल रही थी मर्म वेदना,  करूणा विकल कहानी सी, वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही,  हँसती-सी पहचानी-सी। "ओ चिंता की पहली रेखा,  अरी विश्व-वन...